बुंदेली साहित्य ने समाज में स्थापित कीं मर्यादाएं- मंडलायुक्त
झांसी। बुंदेलखंड साहित्य महोत्सव (बीएलएफ) के चौथे सत्र का शुक्रवार से आगाज हुआ। इस दौरान मुख्य अतिथि मंडलायुक्त बिमल कुमार दुबे ने कहा कि बुन्देली साहित्य ने समाज में मर्यादाएं स्थापित की। इसी परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए जब इसे नई पीढ़ी हाथ में लेती है तो हम कभी परास्त नहीं होंगे। इस समारोह के आयोजन के लिए इस तिथि से उचित कोई और दिन नहीं हो सकता था। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में क्षेत्रीय भाषाओं में बुन्देली को भी स्थान दिया गया।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मंडलायुक्त बिमल कुमार दुबे, विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व डीआईजी पश्चिम बंगाल मृत्युजंय कुमार सिंह, उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मुकेश पांडेय ने की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य अनुकरणीय है, उसे हम तक पहचाने के लिए बहुत ही सरल भाषा में बताया। कवि वृन्दावनलाल वर्मा ने शौर्य और गढ़ कुंडार के किले का इतिहास बताया। हमें यह बात याद रखना कि यदि कोई इतिहास को भुला देता है तो उसे पश्चाताप करना पड़ता है। साहित्य में जीवन की आवश्यकता हमारी वैचारिकता कलात्मकता उसको समृद्ध करने का एक छोटा सा प्रयास है।साहित्य आत्मिक ऊर्जा का संचार करता है। कुलपति पांडेय ने कहा कि प्रयागराज में महाकुम्भ चल रहा है और यहां ज्ञान या साहित्य का कुम्भ चल रहा है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। यह ऐतिहासिक, साहित्य और शौर्य की भूमि है। हैप्पीनेस इंडेक्स के साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और आगे रोबोटिक की बात चल रही है। इसके साथ हमें यह सोचना होगा कि उनमें संवेदना, मानवता, जुड़ाव होगा क्या? जबकि साहित्य की दृष्टि से यही जुड़ाव, संवेदनशीलता पैदा करती है। साहित्य आत्मिक ऊर्जा का संचार करता है। साहित्य, दिल, भावना, अनुभव से निकलता है। यह सिर्फ मानवीय संवेदना से संभव है। इस समारोह में भारतवर्ष का समावेश है। यहां युवा साहित्यकारों को बढ़ावा मिलेगा। इस उत्सव से झांसी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। तीन दिवसीय झांसी किले की तलहटी स्थित जरनल बिपिन रावत शहीद पार्क में रविवार तक चलेगा।पहला सत्र पथ प्रदर्शक श्री राम रहा। इसमें वरिष्ठ पत्रकार राम मोहन शर्मा से उमेश तिवारी ने बातचीत करते हुए बताया कि राम के जीवन में सबसे बड़ी मर्यादा और राजधर्म है, इसलिए वह हमारे पथ प्रदर्शक हैं। राम का जीवन कठिन रास्तों को चुनना सिखाता है और यदि राम के चरित्र का विश्लेषण करेंगे तो कठिन पथ को पार करने और सत्य खोजने का रास्ता मिलेगा।दूसरे सत्र में वरिष्ठ पत्रकार ऋतु भारद्वाज और लेखक सरोज दुबे से युवा पत्रकार ऋचा यादव ने मानसिक स्वास्थ्य पर ‘टाइम टू टॉक अबाउट मेंटल हेल्थ’ विषय के तहत बातचीत की। ऋचा यादव ने कहा कि मन की कहना सब चाहते हैं, लेकिन सुनाने वाला नहीं मिलता। इंसान की दवा, इंसान ही बनते हैं। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की आवश्यकता पड़ रही है। तनाव से बचने के लिए फोन में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की नंबर ज़रूर रखना चाहिए। सरोज दुबे ने कहा कि जीवन के महत्व को समझें। जहां काम कर रहे हैं, वहां से तनाव मिल रहा है तो काउंसलिंग का सहारा लें और फिर भी संतुष्ट न हों तो उचित कार्यक्षेत्र का चुनाव करें।
तीसरा सत्र आदिवासी चिंतन : अस्तित्व का संघर्ष रहा। इसमें युवा पत्रकार कार्तिक द्विवेदी ने आदिवासियों पर लिखने वाले लेखक संदीप मुरारका से बात की। संदीप मुरारका ने कहा कि आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट नहीं है क्योंकि वह अपने मूल से जुड़े हुए हैं। जहां गहरा जंगल, जानवर हैं वहां आदिवासी रहते हैं। बल्कि संकट उन पर है जो राममंदिर बना चुके है, किंतु राम से दूर जा रहे हैं। आदिवासी समाज को साथ लेकर चलते हैं। उनमें समानता का भाव है। उनके यहां दहेज को मान्यता नहीं है। कुछ लोग वर्तमान में दहेज नहीं लेते किंतु विवाह में इतना खर्च करते हैं कि उनमें दहेज से अधिक खर्च हो जाता है। हमें आदिवासियत और उनके स्वभाव को सीखने और उसके महत्व को समझने की जरूरत है।चौथा सत्र सत्र कुछ राग-कुछ रंग विषय पर रहा। इसमें राजभाषा अधिकारी रोहित ने पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी और लेखक मृत्युंजय कुमार से बातचीत की। मृत्युंजय कुमार ने गीत पुल की तरह काम करते हैं। वे जीवन के नए अध्याय से जोड़ते हैं। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए शास्त्रीय संगीत, स्थानीय गीतों ने दबाव से मुक्त और अनुशासन में रहने की सीख दी।पांचवा सत्र में वर्तमान परिवेश में उच्च शिक्षा विषय पर शोधार्थी ओजस्वी भट्ट ने शिक्षाविद डॉ. रचना विमल दुबे से बात की। उन्होंने कहा कि शोध में एआई से मौलिकता खत्म रही है। हम चिंतन से दूर हो रहे हैं। हर बात का हल क्षण भर में हाजिर है। इससे बचना होगा। हमें रटने की नहीं, रचने की परंपरा पर ध्यानकेंद्रित करना होगा। विदेशों की तरह हमें मातृभाषा में उच्च शिक्षण को बढ़ावा देना होगा। भाषाओं के बैरियर से आत्मविश्वास टूटता है। इसलिए उच्च शिक्षा में छात्रों की संख्या घटती है।छठवें सत्र में संचालन जुमला जंक्शन विषय पर वरिष्ठ पत्रकार अरिंदम घोष ने किया। इसमें वरिष्ठ पत्रकार नीरज बधवार शामिल हुए। नीरज ने कहा कि व्यंग्य कठिनतम समस्याओं के हल आसानी से समझाने में मदद करता है। क्योंकि लोग सीधे आलोचना स्वीकार नहीं कर पाते। उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने दिल्ली चुनाव में कांग्रेस की हार पर लिखा कि आज कांग्रेस की हालत ऐसी है कि बाघ भी गले में कांग्रेस की तख्तियां डालकर घूम रहे हैं। आगे उन्होंने कहा कि लोग आज किसी व्यंग्य के कहने वाले की राजनीतिक विचारधारा जानकर हंसना तय कर रहे हैं। इससे राजनीतिक रूप से व्यक्ति विभाजित हो रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए। वहीं, राजनेताओं को भी व्यंग्य पचाने वाला बनना चाहिए, मात्र एक या दो आलोचना से जनता किसी नेता को खारिज नहीं करती। वह अच्छे कार्यों का भी मूल्यांकन करती है। स्वागत भाषण बृजेश दीक्षित ने दिया। संचालन अनिरुद्ध सिंह रावत ने किया। अंत में निंदिया डांसपिरेशन एंड टीम एसारके, एलन हाउस पब्लिक स्कूल, मीराबाई ग्रुप की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। पूरे कार्यक्रम के दौरान विभिन्न प्रकाशकों के बुक स्टाॅल, हैडिक्राफ्ट स्टॉल, बुंदेली भोजन स्टाॅल, अथाई मंच पर ओपन स्टेज कार्यक्रम ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।इस दौरान कार्यक्रम आयोजक चंद्रप्रताप, अनमोल दुबे, ज्योति वर्मा, दीपक प्रजापति, देव, निशु, निकिता, संजीव आदि उपस्थिति रहे।
