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झांसी के चिकित्सकों और आईआईटी के शोधार्थियों का संयुक्त नवाचार — “जेटफ्लो ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर” को मिला भारतीय पेटेंट:- डॉ अंशुल जैन*

ByBKT News24

Feb 27, 2026


झांसी के चिकित्सकों और आईआईटी के शोधार्थियों का संयुक्त नवाचार — “जेटफ्लो ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर” को मिला भारतीय पेटेंट:- डॉ अंशुल जैन*

चिकित्सा एवं इंजीनियरिंग के बहु-विषयक (Multidisciplinary) सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण सामने आया है। “जेटफ्लो ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर फॉर ऑक्सीजन थेरेपी” नामक नवाचार को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा पेटेंट प्रदान किया गया है। यह पेटेंट संख्या 581777 के अंतर्गत 26 फरवरी 2026 को स्वीकृत हुआ है तथा इसकी वैधता 21 अगस्त 2024 से आगामी 20 वर्षों तक रहेगी।
इस तकनीक के पेटेंटधारक डॉ0 रचना चौरसिया एवं डॉ0 अंशुल जैन हैं। आविष्कारकों की टीम में आईआईटी के पीएचडी स्कॉलर्स सोहम गोस्वामी, देबार्था चटर्जी एवं तरुण कुलश्रेष्ठ सहित चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल रहे। यह नवाचार रेडियोडायग्नोसिस एवं एनेस्थीसिया विभाग के चिकित्सकों तथा आईआईटी कानपुर के इंजीनियरों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है।
पेटेंट धारक डॉक्टर अंशुल जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि अस्पतालों के सामान्य वार्ड, आईसीयू तथा इमरजेंसी में जब भी किसी मरीज को ऑक्सीजन दी जाती है, वह ऑक्सीजन स्वाभाविक रूप से “ड्राई” (शुष्क) होती है। मानव श्वसन तंत्र सामान्यतः आर्द्र वायु के अनुकूल होता है। यदि शुष्क ऑक्सीजन सीधे दी जाए तो वह श्वसन पथ (Respiratory Mucosa) की प्राकृतिक नमी को खींच लेती है। इससे गले और श्वासनली में सूखापन, जलन, कफ का गाढ़ा होना तथा लंबे समय में श्वसन पथ को नुकसान होने की आशंका रहती है। इसलिए ऑक्सीजन को आर्द्र (Humidified) करना आवश्यक माना जाता है।
उन्होंने आगे बताया कि वर्तमान में प्रचलित प्रणाली में ऑक्सीजन को पानी से भरे एक जार (Bubble Humidifier) से गुजारा जाता है। ऑक्सीजन पानी के भीतर बुलबुलों के रूप में गुजरती है और उसमें नमी मिलती है। लेकिन इस पद्धति की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ हैं:
यदि पानी में किसी प्रकार का संक्रमण या संदूषण (Contamination) हो जाए, तो सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन के साथ मरीज तक पहुंचने का जोखिम रहता है साथ ही ह्यूमिडिफिकेशन पानी की ऊँचाई (Water Level) पर निर्भर करता है। यदि पानी कम हो जाए तो नमी का स्तर भी कम हो जाता है। उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि अधिक फ्लो रेट पर पर्याप्त आर्द्रता बनाए रखना कठिन होता है। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए नई तकनीक विकसित की गई।
पेटेंटधारक डॉ0 रचना चौरसिया एवम डॉ0 अंशुल जैन ने जानकारी देते विक-आधारित (Wick-Based) ह्यूमिडिफायर की और क्या है विशेषता है पर प्रकाश डालते हुए बताया कि “जेटफ्लो ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर” में ऑक्सीजन को पानी के अंदर से नहीं, बल्कि पानी से भीगे हुए विशेष “विक” (Wick) के ऊपर से गुजारा जाता है। इस प्रणाली में:
विक (Hydrophilic Porous Wick) पानी को केशिकीय क्रिया (Capillary Action) से ऊपर खींचता है।ऑक्सीजन जेट इम्पिंजमेंट तकनीक से उस गीली सतह के संपर्क में आती है और नमी का आदान-प्रदान सतह पर होता है, जिससे पानी की बूंदें बनने की संभावना नहीं रहती है एंव इससे संक्रमण का जोखिम कम होता है।पानी की ऊँचाई कम होने पर भी विक सतह को समान रूप से गीला रखता है, जिससे ह्यूमिडिफिकेशन स्थिर रहता है।
इसके अतिरिक्त यह तकनीक ऊर्जा की दृष्टि से भी अधिक कुशल बताई गई है।
यह आविष्कार चिकित्सा एवं इंजीनियरिंग के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। रेडियोडायग्नोसिस एवं एनेस्थीसिया के चिकित्सकों ने नैदानिक आवश्यकता को परिभाषित किया, जबकि आईआईटी कानपुर के पीएचडी शोधार्थियों श्री सोहम गोस्वामी आईआईटी कानपुर,श्री देबार्था चटर्जी पोस्ट डॉक्टोरल फेलो जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी USA एवं श्री तरुण कुलश्रेष्ठ आईआईटी कानपुर ने इंजीनियरिंग डिजाइन, फ्लूड डायनामिक्स एवं हीट ट्रांसफर सिद्धांतों पर आधारित तकनीकी समाधान विकसित किया।
पेटेंट के विषय में विशेषज्ञों के अनुसार यह नवाचार संसाधन सीमित अस्पतालों, जिला अस्पतालों तथा ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर आधारित सेटअप में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, इस तकनीक का शीघ्र ही औद्योगिक स्तर पर “टेक्नोलॉजी ट्रांसफर” किया जाएगा, ताकि इसका बड़े पैमाने पर निर्माण संभव हो सके और यह उपकरण अस्पतालों में व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जा सके।
पेटेंट धारक डॉ0 अंशुल जैन ने बताया कि चिकित्सा जगत में इसे सुरक्षित, प्रभावी और किफायती ऑक्सीजन ह्यूमिडिफिकेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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जिला सूचना कार्यालय द्वारा प्रसारित